11 Best Inspirational Stories in Hindi जो आपकी ज़िन्दगी बदल देगी

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Inspirational Stories in Hindi

सद्बुद्धि-सद्भावना Inspirational Stories in Hindi

एक सेठ अत्यंत धर्मात्मा थे। वे अपनी आय का बहुत बड़ा हिस्सा सेवा परोपकार जैसे धार्मिक कार्यों में खर्च किया करते थे कई पीढ़ियों से उनके परिवार पर लक्ष्मी की असीम कृपा बनी रहती थी।

एक बार देवी लक्ष्मी के मन में आया कि एक जगह रहते-रहते कई सौ वर्ष हो गए, ऐसे में, क्यों न इस परिवार को त्यागकर कहीं अन्यत्र जाया जाए।

एक दिन लक्ष्मी ने सेठ से स्वप्न में कहा, ‘मैं तुम्हारे यहाँ पीढ़ियों से रहते रहते अब ऊब-सी गई हूँ। किसी के यहाँ ज्यादा दिनों तक रहना भी अच्छा नहीं माना गया है।

अतः मैं अब तुम्हारे घर से प्रस्थान करना चाहती हूँ। चूँकि तुम सबने अपने प्रेमपाश में मुझे बाँधे रखा है, इसलिए जाते-जाते मैं तुम्हें कोई एक वरदान देना चाहती हूँ। तुम अच्छी तरह सोच-समझकर अपनी इच्छानुसार मुझसे कोई एक वरदान माँग लो।’

सेठ ने अपने परिवार के सदस्यों को बुलाकर इस पर विचार-विमर्श शुरू किया। किसी ने सेठ से कहा, देवी लक्ष्मी से असीमित धन माँग लो, तो किसी ने उनसे बहुमूल्य हीरे-जवाहरात माँगने की इच्छा रखी ।

सेठ की वृद्धा माँ परम धर्मात्मा और संतोषी थी। उन्होंने सेठ से कहा, ‘बेटा, माँ लक्ष्मी से यह वरदान माँगो कि हमारे परिवार में सभी की सद्बुद्धि और सद्भावना हमेशा बनी रहे।

सेठ ने यही वरदान माँ लक्ष्मी से माँग लिया। लक्ष्मी ने यह सुना, तो बोलीं, ‘तुम बड़े चतुर आदमी हो। सच-सच बताओ, तुम्हें यह वरदान माँगने की सलाह भला किसने दी?’

सेठ द्वारा माँ का नाम लेने पर लक्ष्मी फिर बोलीं, ‘एक ही वरदान में उन्होंने सबकुछ माँग लिया। जहाँ सद्बुद्धि होगी और प्रेम होगा, वहाँ शील, सत्य और विश्वास को भी स्वतः रहना होगा।

तुम्हारी अनुभवी और सच्ची धर्मात्मा माँ ने तो एक ही वरदान में स्वर्ग माँग लिया है। अब मैं ऐसी दिव्य धर्मात्मा वृद्धा को छोड़कर भला कहाँ जाऊँगी?

शब्दों का जादू Inspirational Stories in Hindi

सेठ अनाथपिंडक भगवान् बुद्ध के परम स्नेहभाजन थे। वे अपने मन की तमाम बातें और वेदना निःसंकोच उनके समक्ष प्रस्तुत कर समाधान पाने की आशा रखते थे।

एक दिन अनाथपिंडक का उदास चेहरा देखकर तथागत ने उनसे पूछा, ‘सेठ, किस समस्या के कारण चिंतित हो?’

उन्होंने बताया, ‘नई बहू सुजाता के व्यवहार के कारण बहुत परेशान हूँ। वह अत्यंत अभिमानी है। बात-बात में पति का अपमान करती है। हमारी अवज्ञा करती है, इसलिए परिवार में कलह होने लगी है।’

तथागत ने कहा, ‘सुजाता को हमारे पास भेजना। हम उसे उपदेश देकर रास्ते पर लाने का प्रयास करेंगे।

सुजाता भगवान् बुद्ध के महत्त्व को जानती थी। वह सत्संग के लिए आई और विनम्रता से उन्हें प्रणाम कर सामने बैठ गई। बुद्ध ने उससे कहा, ‘बेटी, महिलाएँ चार तरह की होती हैं, बधिकसमा,

चोरसमा, मातृसमा और भगिनीसमा। तुम इनमें से किस श्रेणी में आती हो? सुजाता बोली, भगवन्, मैं इनका तात्पर्य नहीं समझ पाई। कृपा करके स्पष्ट रूप से बताएँ।’

बुद्ध ने कहा, ‘जो गृहिणी हमेशा क्रोध करती है, पति का अपमान करने को तत्पर रहती है, उसे शास्त्रों में बधिकसमा कहा गया है । जो संपत्ति का सदुपयोग न करके उसे केवल अपने उपभोग में लाती है, उसे चोरसमा कहा गया है।

जो स्त्री परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सद्व्यवहार करती है, उसे मातृसमा कहा गया है। जो सभी से प्रिय भाई के समान व्यवहार करती है, वह भगिनीसमा कहलाती है।

भगवान् बुद्ध के वचनों ने सुजाता के अभिमान को काफूर कर दिया। उसने उनसे क्षमा माँगते हुए कहा, ‘प्रभो, आप विश्वास रखें, भविष्य में मेरे मुँह से एक भी कटु शब्द नहीं निकलेगा।

मैं सभी का विनीत भाव से आदर करूँगी। मातृसमा मेरा व्यवहार रहेगा।’ कहते-कहते सुजाता के नेत्र सजल हो उठे।

करुणा और प्रेम Inspirational Stories in Hindi

दक्षिण भारत के एक नगर में तिरुविशनल्लूर अय्यावय्यर नामक एक निश्छल हृदय के विद्वान् ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने धर्मशास्त्रों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि करुणा और प्रेम ही धर्म का सार है।

एक बार उनके पिता के श्राद्ध का दिन था। ब्रह्मभोज की तैयारी हो रही थी। श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मण को जो भोजन दिया जाता है, उसे विष्णु भोजन कहा जाता है।

ब्राह्मण श्राद्ध-तर्पण कराने आने ही वाले थे कि अय्यावय्यर दूब (श्राद्ध में उपयोग होने वाली घास) लेने घर के पिछवाड़े गए। उन्होंने देखा कि वहाँ भूख से व्याकुल एक व्यक्ति खड़ा है।

अय्यावय्यर को देखते ही वह बोला, ‘चार दिन से कुछ नहीं खाया है। भूख के कारण प्राण निकले जा रहे हैं। जूठा-बासी जैसा भी भोजन हो, देकर मेरे प्राण बचाओ।’ उसके करुणा भरे शब्द सुनकर अय्यावय्यर का हृदय द्रवित हो उठा।

वे घर के अंदर गए और श्राद्ध की जो सामग्री पत्ते पर रखी थी, लाकर उस भूखे व्यक्ति को भेंट कर दी।

पुरोहित ने यह देखा, तो वह क्रोधित होकर बोला, ‘पंडित होकर भी बिना भोग की सामग्री निम्न जाति के भिखारी को देकर तुमने घोर पाप किया है।

अब तुम्हें प्रायश्चित्त करना पड़ेगा, तभी हम ब्राह्मण भोजन करेंगे।’ क्रोध-अभिमान में पगलाए पुरोहित ने श्राद्ध का भोजन करने से इनकार कर दिया।

तभी अचानक पुरोहित ने देखा कि भगवान् आसन पर बैठे अय्यावय्यर को उपदेश दे रहे हैं, ‘तुम्हारे पिता तुम्हारी करुणा भावना से प्रसन्न हैं। उन्होंने भोजन प्राप्त कर लिया है।’

यह देख पुरोहित अय्यावय्यर के चरणों में झुककर बोला, ‘तुम धन्य हो, भूखे में भगवान् के दर्शन करनेवाला ही सच्चा धर्मात्मा है।

प्राणी में परमात्मा Inspirational Stories in Hindi

एक दिन महर्षि सनतकुमार और देवर्षि नारद सत्संग कर रहे थे। सनतकुमार ने प्रश्न किया, ‘देवर्षि, आपने किन-किन शास्त्रों और विद्याओं का अध्ययन किया है?’

नारदजी ने उन्हें बताया कि उन्होंने वेदों, पुराणों, वाकोवाक्य (तर्कशास्त्र), देवविद्या, ब्रह्मविद्या, नक्षत्र विद्या आदि का अध्ययन किया है, पर उनका ज्ञान मात्र पुस्तकीय है। नारदजी ने विनयपूर्वक महर्षि से ब्रह्मविद्या का ज्ञान कराने की प्रार्थना की।

महर्षि सनतकुमार ने उपदेश देते हुए बताया, ‘वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, प्राण आदि पंद्रह तत्त्वों को जानना चाहिए। सत्य, मति (बुद्धि), कर्मण्यता (पुरुषार्थ), निष्ठा तथा कृति (कर्तव्यपरायणता) आदि का ज्ञान प्राप्त करने से आत्मिक सुख मिलता है।’

उन्होंने आगे कहा, ‘सच्चा सुख तो परमात्मा की सर्वव्यापकता की अनुभूति होने पर ही प्राप्त होता है। इस अनुभूति के होने पर मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि सारा संसार ही उसका परिवार है-वसुधैव कुटुंबकम्।

जब हमारा दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है, तो हम प्राणी मात्र में अपने परमात्मा के दर्शन कर सभी के प्रति सुहृद के समान व्यवहार करते हैं।

धर्मशास्त्रों में कहा गया है, ‘परमात्मा सर्वत्र है। वह सर्वशक्तिमान है। वह नित्य, पवित्र और प्रेम का प्रतीक है। जिसे परमात्मा के प्रति असीम निश्छल प्रेम की अनुभूति होने लगती है,

उसका हृदय-मन तरह सांसारिक आसक्ति से रहित हो जाता है। जीव जब संसार की वासनाओं और क्षणिक आकर्षणों में भटककर थक जाता है, तब उसे परमात्मा की शरण में जाकर ही परम शांति व सुख प्राप्त होता है।

वाणी में संयम Inspirational Stories in Hindi

धर्मशास्त्रों में वाणी संयम पर बहुत बल दिया गया है। मनुस्मृति में कहा गया है, ‘पारुष्यमनृतं चैवं पैशुन्यं चापि सर्वशः। असंबद्ध प्रलापश्च वांगमयं स्याच्चतुर्विधम्।

अर्थात् वाणी में कठोरता लाना, झूठ बोलना, दूसरे के दोषों का वर्णन करना और व्यर्थ बातें बनाना–ये वाणी के चार दोष हैं। इन दोषों से बचने वाला व्यक्ति हमेशा सुखी और संतुष्ट रहता है।’

किसी कवि ने कहा था, ‘रसों में रस निंदा रस है।’ अनेक श्रद्धालु भगवद्कथा सुनने जाते हैं, तीर्थों व सत्संगों में जाते हैं, किंतु वहाँ भी भगवन्लीला के अनूठे प्रेम रस भक्ति रस से तृप्त होने की जगह निंदा रस का रसास्वादन करने से नहीं हिचकिचाते।

मौका मिलते ही दूसरों की निंदा और दोष का वर्णन करने में लग जाते हैं। संस्कृत में दूसरे के दोष देखने को ‘पैशुन दोष’ कहा गया है।

धर्मशास्त्रों में पंचविध चांडालों में पैशुनयुक्त पुरुष को भी एक प्रकार का चांडाल माना गया है। एक संस्कृत श्लोक में बताया गया है कि दूसरे व्यक्ति में दोष देखने वाला,

दूसरों के अवगुणों का वर्णन करनेवाला, किए गए उपकार को याद न रखने वाला तथा बहुत देर तक क्रोध को मन में रखने वाला व्यक्ति चांडाल की श्रेणी में ही आता है।

पैशुन दोष को वाणी के तप द्वारा जीतने की प्रेरणा देते हुए महर्षि कहते हैं, ‘उद्वेग से रहित वाणी का उच्चारण, सत्य, प्रिय और हितकर वचन बोलना,

अनर्गल बातचीत में समय व्यर्थ न करके सत्साहित्य का अध्ययन करना एवं भगवन्नाम का कीर्तन करना वाणी का तप कहलाता है। अतः वाणी से प्रत्येक शब्द सोच समझकर निकालने में ही लाभ होता है।’

अहंकार त्यागो Inspirational Stories in Hindi

राजगृह के राजकीय कोषाध्यक्ष की पुत्री भद्रा बचपन से ही प्रतिभाशाली थी। उसने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध एक युवक से विवाह कर लिया। विवाह के बाद उसे पता चला कि वह दुर्व्यसनी और अपराधी किस्म का है।

एक दिन युवक ने भद्रा के तमाम आभूषण कब्जे में ले लिए और उसकी हत्या का प्रयास किया, पर भद्रा ने युक्तिपूर्वक अपनी जान बचा ली। इस घटना ने उसमें सांसारिक सुख से विरक्ति की भावना पैदा कर दी।

वह भिक्षुणी बन गई। अल्प समय में ही उसने शास्त्रों का अध्ययन कर लिया और उसकी ख्याति विद्वान् साध्वियों में होने लगी। भद्रा को अहंकार हो गया कि वह सबसे बड़ी शास्त्रज्ञ है। उसने पंडितों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारना शुरू कर दिया।

एक बार वह श्रावस्ती पहुँची। उसे पता चला कि अग्रशावक सारिपुत्र प्रकांड पंडित माने जाते हैं। भद्रा ने सारिपुत्र को शास्त्रार्थ की चुनौती दे डाली।

उसने सारिपुत्र से अनेक प्रश्न किए, जिनका सारिपुत्र ने जवाब दे दिया। अंत में सारिपुत्र ने उससे प्रश्न किया, ‘वह सत्य क्या है, जो सबके लिए मान्य हो?’

भद्रा यह सुनते ही सकपका गई। पहली बार उसने किसी विद्वान् के समक्ष समर्पण करते हुए कहा, ‘भंते, मैं आपकी शरण में हूँ।’ सारिपुत्र ने उत्तर दिया, ‘मैं बुद्ध की शरण में हूँ, उनका शिष्यत्व ग्रहण करो।’

भद्रा बुद्ध के पास पहुँची।बुद्ध ने उसे उपदेश देते हुए कहा, ‘देवी, किसी भी प्रकार का अहंकार समस्त सद्कर्मों के पुण्यों को क्षीण कर देता है । धर्म के केवल एक पद को जीवन में ढालो कि मैं ज्ञानी नहीं, अज्ञानी हूँ।’तथागत के शब्दों ने भद्रा को पूरी तरह अहंकारशून्य कर दिया।

शील अनूठा रत्न है Inspirational Stories in Hindi

धर्मशास्त्रों में शील (चरित्र) को सर्वोपरि धन बताया गया है। कहा गया है कि परदेश में विद्या हमारा धन होती है। संकट में बुद्धि हमारा धन होती है। परलोक में धर्म सर्वश्रेष्ठ धन होता है, परंतु शील ऐसा अनूठा धन है, जो लोक-परलोक में सर्वत्र हमारा साथ देता है।

कहा गया है कि शीलवान व्यक्ति करुणा एवं संवेदनशीलता का अजस्र स्रोत होता है। जिसके हृदय में करुणा की भावना है, वही सच्चा मानव कहलाने का अधिकारी है। संत कबीर भी शील को अनूठा रत्न बताते हुए कहते हैं

सीलवंत सबसों बड़ा, सील सब रत्नों की खान। तीन लोक की संपदा, रही सील में आन॥

सत्य, अहिंसा, सेवा, परोपकार-ये शीलवान व्यक्ति के स्वाभाविक सद्गुण बताए गए हैं। कहा गया है कि ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ यानी मानव भगवान् का अंशावतार है।

अतः उसे नर में नारायण के दर्शन करने चाहिए। दीन-दुःखियों की सेवा करनेवाला, अभावग्रस्तों व बीमारों की सहायता करनेवाला मानो साक्षात् भगवान् की ही सेवा कर रहा है।

निष्काम सेवा को धर्मशास्त्रों में निष्काम भक्ति का ही रूप बताया है। स्वामी विवेकानंद तो सत्संग के लिए आने वालों से समय-समय पर कहा करते थे,

‘आचरण पवित्र रखो और दरिद्रनारायण को साक्षात् भगवान् मानकर उसकी सेवा-सहायता के लिए तत्पर रहो। लोक परलोक, दोनों का सहज ही में कल्याण हो जाएगा।

हम अपनी शुद्ध और बुद्ध आत्मा से अनाथों, निर्बलों, बेसहारा लोगों की सेवा करके पितृऋण, देवऋण और आचार्यऋण से मुक्त हो सकते हैं।

नर से नारायण Inspirational Stories in Hindi

हमारे ऋषि-मुनियों तथा धर्मशास्त्रों ने संकल्प को ऐसा अमोघ साधन बताया है, जिसके बल पर हर क्षेत्र में सफलता पाई जा सकती है। स्वाम विवेकानंद ने कहा था,

‘दृढ़ संकल्पशील व्यक्ति के शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं होता। लक्ष्य की प्राप्ति में साधना का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। संकल्प जितना दृढ़ होगा, साधना उतनी ही गहरी और फलदायक होती जाएगी।’

शास्त्रों में कहा गया है, ‘अमंत्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौसधम् । अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः।’ यानी ऐसा कोई अक्षर नहीं है, जो मंत्र न हो। ऐसी कोई वनस्पति नहीं, जो औषधि नहीं हो।

ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो योग्य न हो। । प्रत्येक शब्द में मंत्र विद्यमान है, उसे जागृत करने की कोई योग्यता होनी चाहिए। प्रत्येक वनस्पति में अमृत तुल्य रसायन विद्यमान है,

उसे पहचानने का विवेक चाहिए। व्यक्ति में योग्यता स्वभावतः होती है, किंतु उस योग्यता का सदुपयोग करने का विवेक होना चाहिए।

साधना को लक्ष्य से जोड़कर मानव अपनी योग्यता का उपयुक्त लाभ उठा सकता है। दृढ़ संकल्प और साधना के बल पर मानव नर से नारायण भी बन सकता है।

प्रमाद, अहंकार, असीमित आकांक्षाएँ मनुष्य को दानव बना सकती हैं और इस तरह वे उसके पतन का कारण हैं। इसीलिए भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में सत्संग, सात्त्विकता, सरलता, संयम,

सत्य जैसे दैवीय गुणों को जीवन में ढालकर निरंतर अभ्यास-साधना करते रहने का उपदेश दिया है। संयम का पालन करते हुए साधना में रत रहनेवाला व्यक्ति निश्चय ही अपने सर्वांगीण विकास में सफल होता है।

जिससे सीखा वही गुरु Inspirational Stories in Hindi

भारतीय संस्कृति में गुरु को अत्यंत महत्त्व दिया गया है स्कंदपुराण में कहा गया है, अज्ञान तिमिरंधश्च ज्ञानांजनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः।

यानी जो गुरु अज्ञान के अंधकार में दृष्टिहीन बने अबोध शिष्य की आँखों को ज्ञान का अंजन लगाकर आलोकित करता है, उससे अधिक प्रणम्य कौन है।

पिता और माता को शास्त्रों में नैसर्गिक गुरु बताया गया है। ज्ञान देने वाले शिक्षक और लोक-परलोक के कल्याण का रास्ता सुझाने वाले किन्हीं संत या पंडित को भी गुरु की पदवी दी गई है।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है, ‘गुरु की वाणी वह सूर्य है, जो अज्ञान के अंधकार का उन्मूलन कर देती है।’ अवधूत दत्तात्रेय ने तो अपने जीवन में जिनसे भी कुछ सीखा, उस मधुमक्खी, मृग, अजगर, हाथी आदि चौबीस जीवों को गुरु मानकर उनकी वंदना की है।

धर्मशास्त्र में कहा गया है, ‘सदर को ज्ञानमूर्ति के साथ-साथ द्वंद्वातीत लोभ, मोह, आसक्ति और अन्य अवगुणों से सर्वथा मुक्त होना चाहिए। सदाचारी, निर्लोभी, भगवद्भक्त, निरहंकारी गुरु ही शिष्य के लोक परलोक के कल्याण की सामर्थ्य रखता है।

परम विरक्त संत स्वामी रामसुखदास कहा करते थे, ‘सच्चा गुरु वही है, जो शिष्यों को सांसारिक माया जाल के प्रपंच से सावधान कर उसे सदाचार और भक्ति के पथ पर आरूढ़ करने की क्षमता रखता है।

जो गुरु भगवान् की पूजा-उपासना और धर्मशास्त्रों के पठन-पाठन से हटाकर अपनी पूजा-उपासना कराने में प्रवृत्त करे, उससे बचने में ही कल्याण है। सच्चा गुरु भगवान् से अपनी तुलना सहन ही नहीं कर सकता।’

ढाई आखर प्रेम का Inspirational Stories in Hindi

एक बार सत्संग के दौरान परम भागवत संत अखंडानंद सरस्वती ने अपने गुरु उड़िया बाबा से प्रश्न किया, ‘महाराज, पंडित कौन है?’

उड़िया बाबा ने बताया, ‘शास्त्र में कहा गया है- आत्मज्ञान समारम्भस्तितिक्षा धर्म नित्यता। यमर्थात्रापकर्षन्ति स वै पंडित उच्यते।’ यानी जिन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान है, जो धर्मानुसार जीवन जीते हैं,

दुःख सहन करते हैं और जो धन के लालच में सही रास्ते से नहीं भटकते, वे ही पंडित कहलाते हैं। एक अन्य श्लोक कहते हुए उड़िया बाबा बताते हैं,

‘जो ढंग से सोच-विचार कर काम करता है, आरंभ करने के बाद किसी भी काम को अधूरा नहीं छोड़ता, समय का दुरुपयोग नहीं करता, जिसने इंद्रियों पर नियंत्रण कर लिया है, वही पंडित है।

उपनिषद् में ज्ञानी (पंडित) की परिभाषा में कहा गया है, ‘सभी प्राणियों के अंदर समान आत्मा है, ऐसा अनुभव करनेवाला किसी भी प्रकार के भेदभाव से मुक्त-समदर्शी व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी है।

इस अवस्था में पहुँचने पर ज्ञानी मनुष्य को आत्मा सर्वःभूतमय की अनुभूति होने लगती है। संत कबीर कहते हैं, ‘ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।’

स्वामी रामतीर्थ ने एक बार कहा था, ‘जिसके हृदय में प्रेम नहीं है, संवेदना नहीं है, जीवों तथा दीन-दुःखियों के प्रति करुणा नहीं है, समदर्शी की भावना नहीं है,

भगवान् के प्रति भक्ति-भावना नहीं है तथा भगवान् के नाम में निष्ठा नहीं है, वह चाहे जितना बड़ा ज्ञानी-पंडित हो, उसका ज्ञान निरर्थक है। आत्मा-परमात्मा का ज्ञान रखने वाला तथा सुख-दुःख में सम रहनेवाला ही सच्चा पंडित है।

संकल्प हो तो ऐसा Inspirational Stories in Hindi

गुरु नानकदेवजी अपने उपदेश में कहा करते थे,

कूड़ राजा, कूड़ परजा, कूड़ सभ संसार। कूड़ मंडप, कूड़ माड़ी, कूड़ बैसणहार॥

अर्थात् संसार के सब रिश्ते और पदार्थ झूठे हैं। राजा, प्रजा, महल, धन और ऐश्वर्य के अन्य साधनों में कोई सार-तत्त्व नहीं है। संसार में केवल परमात्मा सच्चा है। इसके बावजूद मनुष्य झूठ से नेह कर रहा है और परमात्मा के नाम को विस्मृत किए बैठा है।

भर्तृहरि ने भी कहा है, ‘मानव जीवन सांसारिक भोगों में बिता देना और सत्कर्मों एवं भगवद्भक्ति से विमुख रहना आत्मघाती कदम है। कुसंग में पड़कर मनुष्य अपना पूरा जीवन भोग-विलास,

राग-द्वेष और झूठी तृष्णाओं-इच्छाओं की पूर्ति में बिता डालता है। ऐसा मनुष्य प्रत्येक क्षण दुःख, शोक, विषाद, अशांति और अवनति की भट्टी में झुलसता रहता है।

शास्त्रों में कहा गया है, मन एव मनुष्यायां कारणं बंधमोक्षयोः। यानी मन में जैसा संकल्प होता है, वैसा ही परिणाम भी मिलता है। अतः यदि आप शुद्ध परिणाम चाहते हैं, तो आपको नित्य शुद्ध संकल्प करना चाहिए।

अपना प्रत्येक क्षण प्रेम, सेवा, परोपकार, कर्तव्य पालन, भगवद्भक्ति, सत्साहित्य के पठन-पाठन में लगाने वाला कभी निराश, दुःखी और अशांत नहीं होता।

वह भय, कलह, शोक, विषाद अवरोध से मुक्त रहकर सहज ही में अपना मानव जीवन सफल बना लेता है। छोटे-मोटे सांसारिक कष्टों की उसे अनुभूति नहीं होती। उसे लगने लगता है कि वह सत्य व सत्संकल्प पर अटल है। अतः परमात्मा स्वतः उसकी सांसारिक नौका पार लगाने को तत्पर हैं।

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