Top 05 Motivational Story in Hindi जो आपकी सोच बदल देगी!

Motivational Story in Hindi:- Here I'm sharing with you the top 05 Motivational Story in Hindi which is really amazing and awesome these Motivational Stories in Hindi will teach you lots of things and gives you an awesome experience. You can share with your friends and family and these moral stories will be very useful for your children or younger siblings.

Motivational Story in Hindi जो आपकी सोच बदल देगी!

Top 05 Motivational Story in Hindi of Life-Changing


कुपात्र को उपदेश
शिक्षा का पात्र
धर्मबुद्धि और पापबुद्धि
उपाय और अपाय
जैसे को तैसा

1. कुपात्र को उपदेश Best Motivational Story in Hindi


किसी पर्वतीय प्रदेश में वाहनों का एक समूह निवास करता या। जाड़े की एक ऋतु एक बार भयंकर वर्षा हुई, साथ ही हिमपात भी होने लगा। वानर ठंड से परेशान हो गए।

वे शरण पाने के लिए इघर-उधर भटकने लगे, किंतु उन्हें कोई भी सुरक्षित स्थान नहीं मिल पाया। कुछ वानर कहीं से लाल रंग के गुंजाफल इकट्ठे कर लाए और उनके इर्द-गिर्द बैठकर ठंड दूर करने का प्रयास करने लगे।

उन्हें लगा कि लाल रंग के गुंजाफल अग्निकण हैं और उनके समीप बैठने से उनकी ठंड दूर हो जाएगी। जिस वृक्ष के नीचे वानर वैठे हुए थे, उस वृक्ष के ऊपर सूचीमुख नाम का एक पक्षी घोंसला बनाकर रहता था।

वानरों के इस व्यर्थ प्रयास को देखकर उसने कहा-'अरे, तुम लोग तो निपट मूर्ख जान पड़ते हो। ये अग्निकण नहीं हैं, ये तो गुंजाफल है।

तुम लोग जाकर किसी ऐसी गुफा या कंदरा में शरण लो जहां ठंडी वायु न हो, क्योंकि वर्षा अभी रुकने वाली नहीं है।' सूचीमुख की बात सुनकर उनमें से किसी वृद्ध वानर ने कहा-'अरे मूर्ख ! तुम्हें इससे क्या ? तुम जाकर अपना रास्ता नापो।'

सूचीमुख कहीं नहीं गया और उनको बार-बार समझाता रहा। बार-बार उसकी बात को सुनकर एक वानर को क्रोध आ गया। उसने सूचीमुख को पकड़कर उसके दोनों पंख उखाड़ लिए और उसे एक शिला पर पटककर मार डाला।

यह कथा सुनाकर करटक कहने लगा-'तभी तो कहता हूं कि अयोग्य को शिक्षा देने का कोई लाभ नहीं हैं। सर्प को दूध पिलाने से उसका विष बढ़ता ही है,

शांत नहीं होता। एक बार एक मूर्ख चिड़िया ने एक वानर को उपदेश दिया तो उसने उसको ही गृहविहीन कर दिया था।

Related
:- 

Bhagwan ki Kahaniya

2. शिक्षा का पात्र Short Motivational Story in Hindi


किसी वन में एक शमी का वृक्ष था। उसकी लम्बी शाखाओं में चटक नामक चिड़िया ने अपना घोंसला बना रखा था। हेमन्त ऋतु में वहां वर्षा शुरू हुई।

ठंडी हवा के झोंकों से सर्दी बढ़ गई। तभी ठंड से कांपता हुआ एक बंदर शमी वृक्ष की छाया में आकर बैठ गया। चटक चिड़िया ने उससे कहा-'अरे भाई, तुम्हारी आकृति तो पुरुष के समान है।

पुरुषों की तरह तुम्हारे हाय-पैर भी हैं, फिर ठंड से क्यों कांप रहे हो? अपने रहने के लिए घर क्यों नहीं बना लेते ?' यह सुनकर बंदर को क्रोध आ गया और बोला-'अरी ओ चूं-चूं की बच्ची! तू खामोश क्यों नहीं रहती?

मेरे साथ धृष्टता करती है ? मजाक उड़ाती है मेरा? चुपचाप पड़ी रह। मेरी चिंता मत कर। जब चटक चिड़िया फिर भी नहीं मानी और अपने घोंसले में बैठकर अपनी बात फिर दोहराई,

तो बंदर ने चिढ़कर शमी वृक्ष पर बने उसके घोंसले को नष्ट कर दिया। यह कथा सुनाकर करटक ने दमनक से कहा-'तुम भी ऐसे ही मूर्ख हो। तुम्हें उपदेश देने से भी कोई लाभ नहीं।

दुष्ट व्यक्ति अपने विनाश से उतना दुखी नहीं होता जितना कि वह दूसरों को सुखी देखकर होता है। दुओं का यह स्वाभाविक गुण है।

धर्मबुद्धि और पापबुद्धि को मैं भली-भांति जानता हूं। उनमें से पापबुद्धि ने ही अपने पिता को मार डाला था।'

Related:- 


3. धर्मबुद्धि और पापबुद्धि Motivational Story in Hindi for Success


किसी नगर में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। दोनों विदेश चले गए और देश-देशांतरों में घूमकर दोनों ने काफी धन कमा लिया।

जब वे वापस आ रहे थे तो नगर के पास पहुंचकर पापबुद्धि ने सलाह दी कि इतने धन को अपने बंधु-बांधवों के पास नहीं ले जाना चाहिए। इसे देखकर उन्हें ईर्ष्या होगी, लोभ होगा।

इसलिए इस धन का बड़ा भाग यहीं कहीं जमीन में गाड़ देते हैं। जब आवश्यकता होगी, लेते रहेंगे। धर्मबुद्धि उसकी बात मान गया।

जंगल में एक स्थान पर उन्होंने वह धन जमीन में गाड़ दिया और कुछ धन लेकर वे दोनों अपने-अपने घर जा पहुंचे। लेकिन पाप बुद्धि के मन में तो पाप समाया हुआ था।

एक दिन अवसर पाकर वह वन में गया और सारा धन निकाल लाया। फिर एक दिन पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के पास जाकर कहा-'मित्र! मेरा धन तो समाप्त हो गया है। तुम कहो तो उस स्थान पर चलकर कुछ धन निकालकर ले आएं ?'

धर्मबुद्धि उसके साथ चलने को तैयार हो गया। वहां जाकर जब उन्होंने उस स्थान को खोदा तो जिस पात्र में धन रखा था, वह खाली पाया। पापबुद्धि ने वहीं पर अपना सिर पीटना आरंभ कर दिया।

उसने धर्मबुद्धि पर आरोप लगाया कि उसने ही वह धन चुराया है। उसने कहा कि वह जो धन लेकर गया है उसका आधा भाग उसको दे दे, अन्यथा वह राजा के पास जाकर निवेदन करेगा। धर्मबुद्धि को यह सुनकर क्रोध आ गया।

उसने कहा-'मेरा नाम धर्मबुद्धि है। मेरे सामने इस तरह की बातें फिर कभी न कहना। मैं इस प्रकार की चोरी करना पाप समझता हूं।' इस प्रकार दोनों के मध्य विवाद बढ़ गया।

दोनों व्यक्ति न्यायालय में चले गए और एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर एक-दूसरे को दोषी सिद्ध करने लगे। न्यायाधीशों ने जब सत्य जानने के लिए दिव्य परीक्षा का निर्णय दिया तो पापबुद्धि बोल उठा यह उचित न्याय नहीं है।

सर्वप्रथम लेखबद्ध प्रमाणों को देखना चाहिए, उसके अभाव में साक्षी दी जाती है, और जब साक्षी भी न मिले तो फिर दिव्य परीक्षा दी जाती है। मेरे इस विवाद में अभी वन देवता साक्षी हैं। वे इसका निर्णय कर देंगे।

न्यायाधीशों ने कहा-'ठीक है, ऐसा ही कर लेते हैं।' इस प्रकार अगले दिन प्रातःकाल उस वृक्ष के समीप जाने का निश्चय किया गया। उन दोनों को भी साथ चलने को कहा गया।

घर पहुंचकर पापबुद्धि ने अपने पिता से कहा-'मैंने धर्मबुद्धि के बहुत-से धन का अपहरण कर लिया है। अगर आप मेरे पक्ष में गवाही दे दें तो मेरे प्राण और धन, दोनों बच जाएंगे।'

उसका पिता ने अपने पिता से कहा-'जंगल में जहां धन गड़ा था वहां एक शमी का वृक्ष है। उस वृक्ष में एक खोखल है। आप उस खोखल में जाकर छिप जाओ।

जब प्रातः हम लोग राजपुरुषों के साथ वनदेवता की गवाही लेने आएं तो आप उस पेड़ में छिपे हुए कह देना कि धर्मबुद्धि चोर है।' जैसा पुत्र वैसा पिता। पापबुद्धि का पिता उसी रात उस वृक्ष के खोखल में जाकर बैठ गया।

दूसरे दिन प्रातःकाल पापबुद्धि न्यायाधीशों तथा धर्मबुद्धि को लेकर उस स्थान पर गया, जहां धन गाड़ रखा था। वहां पहुंचकर पापबुद्धि ने घोषणा की-'समस्त देवगण मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं।

हे वनदेवता, हम दोनों में से जो चोर हो, आप उसका नाम बता दीजिए।' खोखल में छिपे पापबुद्धि के पिता ने यह सुनकर कहा-'सज्जनो ! मेरी बात आप ध्यानपूर्वक सुनिए। उस घन को धर्मबुद्धि ने ही चुराया है।'

यह सुनकर सब आश्चर्यचकित रह गए। तब धर्मबुद्धि के इस अपराध के लिए उसके दंड का विधान देखा जाने लगा। अवसर पाकर धर्मबुद्धि ने इधर-उधर से घास-फूस एकत्रित की,

कुछ लकड़ियां भी सुनी और उस खोखल में डालकर उसमें आग लगा दी। पुत्रमोह में उसके लिए यह कहने को तैयार गया। तब पापबुद्धि अग्नि में झुलसता पापबुद्धि का पिता कुछ देर तक तो सहन करता रहा;

किंतु जब असह्य हो गया तो अपना अधजला शरीर और फूटी आंखें लेकर खोखल से बाहर निकल आया। उसे देख धर्म अधिकारियों ने कहा-'आप कौन हैं और आपकी यह दशा किस प्रकार हुई ?

पापबुद्धि के पिता ने तब सारा वृत्तांत सुना दिया। धर्म अधिकारियों ने जो दंड व्यवस्था धर्म बुद्धि के लिए निश्चित की थी, वह पापबुद्धि पर लागू करके उसको उसी शमी के वृक्ष पर लटका दिया।

धर्म बुद्धि की प्रशंसा करते हुए धर्माधिकारियों ने कहा—'चतुर व्यक्ति को उपाय के साथ ही अपाय को भी सोच लेना चाहिए।

लाभ और हानि इन दोनों पक्षों पर विचार न करने पर एक मूर्ख बगुले के समक्ष ही उसके सभी अनुयायियों को एक नेवले ने मार डाला था।'

Related:-


4. उपाय और अपाय Motivational Story in Hindi for Students


Motivational Story in Hindi for Students

किसी वन प्रदेश में बरगद का एक पेड़ था। उस पर अनेक बगुले रहते थे। एक कोटर में एक काला नाग भी रहता था। वह बगुले के बच्चों को खाकर अपना जीवन व्यतीत करता था।

एक दिन एक बगुले ने उस नाग को बगुलों के बच्चे खाते देख लिया। इससे उसे बड़ा आघात पहुंचा। वह दुखी होकर अपना मुंह झुकाए हुए सरोवर के किनारे आंसू बहाने लगा।

बगुले को इस प्रकार रोते देखकर एक केकड़े ने उसके रोने का कारण पूछा तो बगुला बोला-'इस पेड़ में ही रहने वाला एक काला नाग हमारे बच्चों को खा जाता है। इसी से मैं दुखी हूं।

क्या तुम उसको मारने का कोई उपाय बता सकते हो ?' केकड़ा सोचने लगा कि यह बगुला तो उसका जातिगत शत्रु है, इसलिए झूठ-सच मिलकर इसे कोई ऐसा उपाय बताऊं कि बाकी बगुलों का भी अन्त हो जाए।

फिर प्रत्यक्ष में कहा—'मामा ! यदि आप मछलियों के मांस के टुकड़े आदि लाकर नाग के कोटर से लेकर नेवले के बिल तक रास्ते में बिखेर दें तो नेवला उन टुकड़ों को खाते हुए नाग के बिल तक पहुंच जाएगा।

और जातिगत वैर के कारण उस सर्प को मार डालेगा।' बगुले ने ऐसा ही किया। नेवला मांस के टुकड़ों के सहारे नाग तक पहुंचा और उसे मार डाला।

किंतु उसके बाद नेवला वहां से गया नहीं, उसे सहज ही भोजन मिलने का लालच जो हो चुका था। अतः उसने बगुलों को भी खाना शुरू कर दिया। और धीरे-धीरे एक-एक करके वह सारे बगुलों को चट कर गया।

यह कथा सुनाकर धर्म अधिकारियों ने धर्मबुद्धि से कहा-'इस मूर्ख पापबुद्धि ने अपनी चोरी छिपाने के लिए उपाय तो सोच लिया; किंतु उससे होने वाली हानि के बारे में तनिक भी नहीं सोचा।

इसी का कुपरिणाम इसे भोगना पड़ रहा है।' उक्त दोनों कथाओं को समाप्त करने के बाद करटक ने दमनक से कहा-'उस पापबुद्धि की तरह तुमने भी अपनी स्वार्थसिद्धि का उपाय तो सोच लिया;

किंतु उससे होने वाली हानि के बारे में नहीं सोचा। तुम भी पापबुद्धि की तरह ही दुर्मति हो। यदि तुम अपने स्वामी को इस स्थिति में पहुंचा सकते हो तो फिर हमारे जैसे छोटे व्यक्तियों की तो गणना ही क्या है !

अतः आज से तुम्हारा और मेरा कोई संबंध नहीं। कहा भी गया है कि जिस स्थान में लोहे की भारी तराजू को चहे खा सकते हैं, वहां यदि बाज किसी बालक को उठाकर ले जाता है तो इसमें संदेह की कोई बात नहीं।

वहां तो कोई भी अविश्वसनीय घटना किसी भी क्षण घट सकती है।

Related:- 


5. जैसे को तैसा Motivational Stories for Kids


Motivational Stories for Kids

किसी नगर में जीर्णधन नामक एक वैश्य का पुत्र रहता था। उसकी सभी सम्पदा नष्ट हो चुकी थी। उसने सोचा कि विदेश में जाकर धन कमाया जाए। उसके घर में उसके पूर्वजों द्वारा बनवाई गई बहुत भारी लोहे की तराजू रखी थी।

उसने वह तराजू एक महाजन के यहां गिरवी रख दी और उससे प्राप्त धन को लेकर विदेश चला गया। विदेश में उसका भाग्य चमका। उसने देश-विदेशों में घूमकर काफी धन कमाया और उस धन को लेकर अपने नगर में वापस लौट आया।

वह सीधे महाजन के पास पहुंचा और उससे बोला-'सेठजी ! मेरी वह बंधक रखी हई तराज दे दो और अपने रुपए ले लो।' महाजन ने बड़े दुख से कहा-'अरे भाई, क्या करूं, तुम्हारी वह तराजू तो चूहे खा गए हैं।

वैश्यपुत्र को क्रोध तो बहुत आया, किंतु उस समय उसने प्रकट नहीं किया। वह बोला-'सेठजी ! इसमें आपका क्या दोष ? जब तराजू को चूहों ने खा ही लिया तो आप भी क्या कर सकते हैं ? अच्छा, अभी मैं स्नान के लिए जा रहा हूं।

कृपा करके आप अपने पुत्र को मेरे साथ भेज दीजिए, जिससे जब मैं स्नान करू तो वह बाहर रखी चीजों की देखभाल करता रहे। महाजन ने इस भय से कि कहीं यह वैश्य पुत्र मुझ पर तराजू की चोरी का इल्जाम न लगा दे,

अपने बेटे धनदेव को उसके साथ भेज दिया। नदी किनारे पहंचकर जीर्णधन ने स्नान किया और फिर महाजन के बेटे धनदेव को एक गुफा में बंद कर वापस महाजन के पास लौट गया।

उसे अकेला आते देख महाजन ने पूछा-'मेरा पुत्र कहां है ?" जीर्णधन बोला-'क्या बताऊं सेठजी ! आपके बेटे को तो एक बाज उठा ले गया।' यह सुनकर महाजन क्रोधित हो उठा-'क्या बकते हो ?

बाज भी कहीं लड़के को उठा सकता है ? मेरे लड़के को लाकर दो, नहीं तो मैं न्यायालय में जाऊंगा।' जीर्णधन बोला-'सेठजी ! यदि लोहे की तराजू को चूहे खा सकते हैं तो लड़के को भी बाज उठाकर ले जा सकता है।

दोनों न्यायालय में पहुंचे। प्रथम महाजन ने ही अभियोग लगाते हुए कहा—'महाशय ! इस वैश्यपुत्र ने मेरा पुत्र चुरा लिया है।'

न्यायाधीशों ने जब प्रश्न-भरी दृष्टि से वैश्यपुत्र की ओर देखा तो उसने कहा—'महोदय, मैं क्या करूं? इसके पुत्र को तो मेरे देखते-ही-देखते नदी किनारे से एक बाज उठाकर ले गया।

अब मैं उसे कहां से लाकर दूं?' न्यायाधीशों को वैश्य पुत्र की बात पर विश्वास न आया। वह बोले-'यह असंभव है। बाज लड़के को कैसे उठाकर ले जा सकता है ? इस पर जीर्णाधन ने उत्तर दिया-'महोदय ।

जहां पर सहस्र पल (भार विशेष) भारी ठोस लोहे की तराजू को चूहे खा सकते हैं, क्या वहां महाजन के पुत्र को बाज उठाकर नहीं ले जा सकता?' 'यह क्या मामला है ?' न्यायाधीश बोला-'तुम हमें सारी बातें स्पष्ट बताओ।

तब वैश्यपुत्र ने आदि से अंत तक का सारा विवरण न्यायाधीशों को बता दिया। न्यायाधीशों ने तब महाजन को वैश्य पुत्र की तराजू वापस करने और वैश्यपुत्र को महाजन का पुत्र वापस करने का आदेश दिया।

यह कथा सुनाकर करटक ने दमनक से कहा-'तुम संजीवक पर स्वामी की कृपा देखकर उससे ईर्ष्या करते थे, इसलिए तुमने ऐसा अनर्थ किया।

अरे मूर्ख, तुमने तो हित को अनहित में बदल दिया। इसलिए कहा गया है कि शत्रु अगर विद्वान व्यक्ति हो, तो भी अच्छा है।

मूर्ख व्यक्ति कितना भी हितैषी बने, तो भी अनुचित है। एक बंदर के हितैषी बनने पर एक राजा को अपने प्राण गंवाने पड़े थे, एक चोर ने मित्र बनकर एक ब्राह्मण के प्राण बचाए थे।'

Also Read:-


Thank you for reading Top 05 Motivational Story in Hindi which really helps you to learn many things of life which are important for nowadays these Motivational Stories in Hindi are very helping full for children those who are under 18. If you want more stories then you click on the above links which are also very interesting.

Post a Comment

0 Comments