Top 10 Child Hindi Moral Story Download 2020 हिंदी में

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Top 10 Child Hindi Moral Story Download

Child Hindi Moral Story Download 2020


शेर और भेड़िया New Hindi Moral Story Download


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एक जंगल में एक भेड़िया रहता था। एक दिन वह भूखा था। इसलिए शिकार की खोज में जहाँ-तहाँ भटक रहा था। भटकते-भटकते वह एक ऐसे मैदान के पास पहुँचा, जहाँ बहुत-सी भेड़ें घास चर रही थीं।

भेड़ों को देखकर भेड़िये के मुँह में पानी आ गया और वह एक झाड़ी में छिप कर किसी भेड़ या मेमने के वहाँ आने की प्रतीक्षा करने लगा। उसे पूरी आशा थी कि कोई न कोई भेड़ उधर जरूर आएगी।

थोड़ी ही देर में एक मेमना घास चरते हुए अपने झुण्ड से अलग होकर उसे झाड़ी के पास पहुँच गया, जहाँ भेड़िया छिपा बैठा था भेड़िये ने तुरन्त मेमने को अपने मुँह में दबोच लिया।

अब भेड़िये के मन में विचार आया कि क्यों न मेमने को ऐसे स्थान पर जाकर खाया जाए, जहाँ कोई अन्य जानवर ना आता हो। ताकि भोजन शांति के साथ किया जा सके।

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दुर्भाग्यवश रास्ते में उसे एक शेर मिला जो स्वयं भी शिकार की खोज में था। भेड़िये के मुँह में मेमना देखकर शेर जोर से गुर्राया और बोला, "जहाँ खड़े हो वहीं रुक जाओ, एक कदम भी आगे मत बढ़ाना।"

भेड़िया डर के मारे बुत बनकर वहीं खड़ा हो गया और उसके मुँह से मेमना छूटकर जमीन पर गिर गया। शेर ने भेड़िये का भोजन उठाया और उसे अपने मुँह में दबाकर अपनी गुफा की ओर चल दिया।

वह बिना अधिक प्रयास किए ही खाना मिलने पर खुश था। अभी शेर कुछ ही कदम बढ़ा था कि भेड़िया धीरे से बुदबुदाया, "यह तो दिन दहाड़े चोरी है। क्या जंगल के राजा को किसी से शिकार छीनना शोभा देता है?

राजा को तो अपनी प्रजा का ध्यान रखना चाहिए लेकिन यहाँ तो उल्टा ही हो रहा है। राजा ही सरासर अन्याय कर रहा है। किसी का हक छीन रहा है। यदि हमारे साथ कोई दूसरा प्राणी अन्याय करता तो हम उसकी शिकायत राजा से करते।

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पर अब राजा की शिकायत किस से करें। कहाँ जाकर इस अन्याय के विरुद्ध गुहार लगाएँ।" शेर ने भेड़िये के शब्द सुने तो वह जोर से हंस पड़ा। वह पीछे पलटा और उसने भेड़िये से कहा,

"कितने आश्चर्य की बात है कि एक चोर न्याय की बात करता है। क्या तुम्हें ये मेमना उपहार में मिला था? तुमने भी तो इसे झाड़ियों में छुप कर चुराया है। क्या यह न्यायपूर्ण है?

क्या एक चोर का चोरी के विषय में न्याय माँगना शोभनीय है?" शेर की बातें सुनकर भेड़िया शर्मिन्दा हो गया और वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गया।

शिक्षा:- अन्याय चाहे छोटा हो या बड़ा, अन्याय होता है।

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बुरी संगत Amazing Hindi Moral Story Download


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एक समय की बात है, एक गाँव में एक किसान रहता था। उसके पास एक छोटा सा खेत था। अपने खेत पर वह कड़ी मेहनत करके बहुत अच्छी फसल उगाता था। परन्तु कुछ समय से उसे एक कौवे ने बहुत परेशान कर रखा था।

वह कौआ किसान के खेत के निकट ही एक पेड़ पर रहता था। जब फसल पककर तैयार हो जाती थी तो वह कौवा अपने सभी साथियों को बलाकर फसल पर धावा बोल देता था और फसल को बहुत नुकसान पहुँचाता है।

बहुत सोच-विचार करने पर किसान ने इस परेशानी से छुटकारा पाने का एक उपाय ढूँढ निकाला। एक रात किसान ने अपने खेत में जाल बिछा दिया और जाल के ऊपर अनाज के बहुत सारे दाने फैला दिए।

पौ फटने पर जैसे ही कौवे की नजर अनाज के दानों पर पड़ी, तो उसने अपने सभी साथियों को अनाज पर धावा बोलने के लिए पुकारा। थोड़ी ही देर में खेत में बहुत सारे कौवे अनाज चुगने के लिए उतर आए।

दुर्भाग्य से एक कबूतर भी उन कौवों के साथ खेत में अनाज चगने आ गया और उन सभी कौवों के साथ किसान के बिछाए जाल में फंस गया।

शाम को जब किसान खेत पर आया तो उन सारे कौवों को जाल में फंसा देखकर फूला न समाया। वह बोला, "दुष्ट पक्षियों! तुमने मेरी फसल को बहुत नुकसान पहुँचाया है। मेरी खून-पसीने की कमाई पर तुम हमेशा हाथ साफ करते रहे।

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आज तुम्हें अपने किए की सजा मिलेगी। दोबारा कोई भी कौआ इस प्रकार का दुस्साहस नहीं करेगा।" तभी किसान को गुटर गूँ की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही किसान ने जाल पर एक नजर दौड़ाई,

उसे कौवों के बीच एक सफेद कबूतर फंसा हुआ दिखाई दिया। कबूतर बहुत डरा हुआ था। किसान को कबूतर पर बहुत दया आई क्योंकि वह जानता था कि कबूतर निर्दोष है और आज गलती से कौवों के साथ आ गया है।

इसलिए वह जाल के पास गया और उसने बहुत सावधानीपूर्वक कबूतर को जाल से छुड़ा लिया। फिर वह कबूतर से बोला, "कभी भी दुष्ट पक्षियों की संगत में मत रहो। ये कुसंगति का ही परिणाम था कि तुम भी जाल में फंस गए।

कुसंगति का नतीजा हमेशा बुरा होता है। आज तो मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ पर अब दुबारा ऐसी गलती मत दोहराना।" ऐसा कह कर किसान ने कबूतर को आसमान में छोड़ दिया। उड़ते हुए कबूतर ने किसान को धन्यवाद कहा।

फिर किसान ने अपने खेत की रखवाली करने वाले कुत्तों को बुलाया और उन्हें कौवों का अंत करने के लिए खेत में छोड़ दिया। कुत्तों ने कौवों को खाकर दावत उड़ाई।

शिक्षाः बुरी संगत का बुरा परिणाम।

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धूर्त भेड़िया और चतुर घोड़ा Unique Moral Story Download in Hindi


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एक बार एक भेड़िया भोजन की खोज में जंगल में भटक रहा था। दुर्भाग्यवश उसे जंगल में खाने के लिए कुछ भी नहीं मिला। भोजन की खोज में चलते-चलते वह जंगल के किनारे पहुँच गया, जहाँ एक गाँव बसा हुआ था।

जंगल के समीप ही गाँव वालों के खेत थे। भेड़िया कुछ देर इधर-उधर भटकता रहा। तभी भेड़िये ने देखा कि एक खेत में एक घोड़ा घास चर रहा है। उस घोड़े की टाँग में चोट लगी थी जिससे वह लंगड़ाकर चल रहा था।

भेड़िये से भूख सहन नहीं हो रही थी। इसलिए जब उसने घायल घोड़े को देखा तो उसके मन में यह विचार आया कि क्यों न घोड़े की टाँग पर से थोड़ा-सा मांस खींच लिया जाए।

लंगड़ा घोड़ा पीछा भी नहीं कर पाएगा और मुझे खाना भी मिल जाएगा। घोड़े का मांस खाने के लिए भेड़िये ने मन ही मन एक योजना बनाई। घोड़े के निकट जाकर भेड़िया बोला, "नमस्कार, घोड़े भाई! आप कैसे हैं?

आपको देखकर मुझे बड़ी खुशी हुई।" घोड़ा बोला, "मैं अच्छा हूँ! आप कैसे हैं? कहिए आज इधर कैसे आना हुआ? वैसे तो आप कभी इधर आते नहीं हैं।" "बस, यूं ही घूमते-घूमते पहुँच गया। लगता है, आपकी टाँग में कोई गहरी चोट लगी है।

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मैंने देखा कि आप लँगड़ा कर चल रहे हैं।"भेड़िये ने बहुत ही धूर्तता से पूछा। घोड़े ने कहा, "मेरे पैर में एक कील चुभने से घाव हो गया है। इसके कारण मैं ठीक से चल-फिर नहीं सकता। बड़ी कठिनाई से चलता हूँ।

मेरी चाल भी बिगड़ गई है। अब मैं लँगड़ाये बिना नहीं चल पाता। कभी-कभी तो पैर में असहनीय दर्द भी होता है। कभी-कभी घाव ऐसा होता है, जो लंबे समय तक दर्द देता है।" भेड़िये ने झूठी सहानुभूति जताते हुए पूछा,

"अरे! यह तो बहुत बुरा हुआ। एक छोटी-सी कील ने आपको कितना कष्ट दे दिया। क्या मैं करीब से आपका घाव देख सकता हूँ कि यह कितना गहरा है और क्या इसका कोई उपचार हो सकता है या नहीं?" घोड़ा समझदार था।

उसे तुरन्त समझ आ गया कि भेड़िये के मन में क्या है। घोड़े ने भेड़िये को सबक सिखाने की ठान ली और भेड़िये को अपनी टाँग देखने की आज्ञा दे दी। भेडिया बहुत प्रसन्न हुआ। उसे लगा कि उसकी चाल कामयाब हो गई है।

बिना एक पल भी गंवाए वह तुरंत घोड़े के पीछे जा खड़ा हुआ और घोड़े की टाँग से मांस खींचने के लिए तैयार हो गया। घोड़ा भी बहुत सावधान था। जैसे ही भेड़िये ने अपना मुँह खोला,

घोड़े ने उसे इतनी जोर से दुलत्ती मारी कि भेडिया दूर जा गिरा। उसके मुँह से खून बहने लगा। भेड़िये ने भाग जाने में ही अपनी भलाई समझी और वह उसी समय वहाँ से सिर पर पैर रख कर भाग लिया।

शिक्षा:- अधिक चतुरता मूर्खता की निशानी है।

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चतुर बिल्ली Best Hindi Moral Story Download


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एक समय की बात है। एक जंगल में एक लोमड़ी शिकार की खोज में भटक रही थी। अचानक उसकी मुलाकात एक जंगली बिल्ली से हुई। दोनों ने एक दूसरे का अभिवादन किया और फिर आपस में बातचीत करने लगीं।

बातों-बातों में लोमडी बोली, "मुझे तो शिकारी कुत्तों से बहुत नफरत है।" "मुझे भी।" बिल्ली ने सहमति जताते हुए कहा। लोमड़ी शेखी बघारते हुए बोली, "वैसे तो शिकारी कुत्ते बहुत तेज़ दौड़ते हैं पर फिर भी मुझे नहीं पकड़ पाते हैं।

मेरे पास उनसे बचने की कई तरकीबें हैं।" बिल्ली ने पूछा, "अच्छा, वो क्या तरकीबें हैं?" इस पर लोमड़ी ने इतराते हुए जवाब दिया, "कौन-कौन-सी बताऊँ, बहुत सारी तरकीबें हैं। उनमें से कुछ हैं, जैसे-काँटों की झाड़ी में छुप जाना,

बिल में घुस जाना, इत्यादि।" बिल्ली बोली, "मैं तो केवल एक ही ठोस तरकीब जानती हूँ।" लोमड़ी ने बिल्ली का मजाक उड़ाते हुए कहा, "कितने दुख की बात है कि तुम केवल एक तरकीब जानती हो।

मुझे तो आश्चर्य है कि केवल एक तरकीब से तुम भला किस तरह अपना बचाव कर पाती हो। जंगल में कदम-कदम पर हमें हिंसक जानवरों का सामना करना पड़ता है।

इसलिए यदि तुम चाहती हो कि तुम्हारा जीवन सुरक्षित रहे तो तुम्हें कुछ और भी उपाय जानने आवश्यक हैं। अन्यथा तुम कभी भी किसी बड़ी मुसीबत में फंस सकती हो।" यह बात सुनकर बिल्ली थोड़ा क्रोधित स्वर में बोली,

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"मैं तुमसे एक बार कह चुकी हूँ कि मुझे ' और उपाय जानने में दिलचस्पी नहीं है। मैं अपना बचाव स्वयं कर सकती हूँ और अब तक करती आई हूँ।" लोमड़ी ने व्यंग्य कसते हुए पूछा, "अच्छा! क्या मैं जान सकती हूं कि वह तरकीब क्या है?"

बिल्ली बोली, "वह तो मैं तम्हें अभी बता देती हूँ परन्तु पहले जरा नजर घुमाकर पीछे तो देखो। ऐसा लगता है कि शिकारी कुत्तों का झुण्ड हमारी ओर ही आ रहा है।"

ऐसा कहते ही बिल्ली दौडकर एक पेड़ पर चढ़ गई और एक ऊँची-सी डाल पर जा बैठी। उसे अपनी अक्लमंदी पर घमंड करने वाली लोमड़ी पर दया आ रही थी क्योंकि उसका अंत पीछे खड़ा था।

कुत्तों को देखकर लोमड़ी बहुत घबरा गई और वह कंटीली झाड़ियों में छुपने के लिए दौड़ी। लेकिन शिकारी कुत्तों ने उस का पीछा करके उसे पकड़ लिया और उसको मार डाला।

शिक्षाः विपत्ति से हमेशा चौकस रहना चाहिए।

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शेर और चूहा Animals Hindi Moral Story Download

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एक बार एक शेर दोपहर के समय एक पेड़ की छाया में सुस्ता रहा था। गर्मियों का मौसम था और तेज धूप निकली हुई थी। पेड़ की ठंडी छाया में शेर को थोडी ही देर में गहरी नींद आ गई। उस पेड़ के पास ही एक चूहे का बिल था।

चूहा थोड़ी देर के लिए अपने बिल से बाहर निकला। बाहर निकलते ही चूहे की नजर जैसे ही सोते हुए शेर पर पड़ी तो उसे एक मजाक सूझा। वह शेर के ऊपर चढ़ा और खेल कूद करने लगा। इससे शेर की नींद खुल गई।

चूहे को देखकर शेर की त्यौरियां चढ़ गई और वह उसे मारने के लिए तैयार हो गया। शेर को गुस्से में देखकर चूहा घबरा गया। वह गिड़गिड़ा कर शेर से माफी माँगने लगा। चूहा बोला,"महाराज! मैं तो एक छोटा-सा चूहा हूँ।

मुझ से भारी गलती हो गई। मुझे माफ कर दीजिए। कभी जरूरत पड़ी तो मैं आपके काम अवश्य आऊँगा।" चूहे की बात सुनकर शेर को हंसी आ गई। वह बोला, "तुम क्या मेरी मदद करोगे। फिर भी मैं आज तुम्हें छोड़ देता हूँ,

दुबारा ऐसी गलती मत करना।" ऐसा कहकर उसने चूहे को अपनी पकड़ से आजाद कर दिया। बहुत दिनों बाद, एक दिन शेर फिर उसी पेड़ की छाया में सुस्ताने आया। परन्तु उस दिन एक शिकारी ने उस पेड़ के नीचे जाल बिछा रखा था।

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दुर्भाग्यवश शेर उस जाल में फंस गया। शेर ने जाल से निकलने का बहुत प्रयास किया, परन्तु वह असफल रहा। अंत में निराश होकर शेर जोर-जोर से दहाड़ने लगा। शेर की दहाड़ सुनकर चूहा फौरन अपने बिल से बाहर निकल आया।

चूहे ने शेर को देखते ही पहचान लिया कि यह वही दयालु शेर है, जिसने उसे क्षमादान दिया था। चूहे ने तुरन्त शिकारी के जाल को अपने पैने दाँतों से कुतरना शुरू कर दिया और शीघ्र ही शेर को जाल से आजाद करा दिया।

शेर ने चूहे को अपनी जान बचाने के लिए धन्यवाद कहा तो चूहा बोला, "महाराज, उस दिन आपने मेरी गलती को माफ करके मुझे छोड़कर मुझ पर उपकार किया था तो भला मैं आपको मुसीबत में देखकर आपकी मदद कैसे न करता।"

शिक्षाः दयालुता कभी व्यर्थ नहीं जाती।

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मेहनती चींटी Kids Hindi Moral Story Download


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गर्मियों के दिन थे। एक चींटी अनाज के दाने उठा-उठाकर अपनी बिल में जमा कर रही थी। वह सर्दियों के लिए अपना भोजन इकट्ठा कर रही थी। पास में ही एक टिड्डा, एक छोटे से पौधे पर बैठा हुआ मस्ती में गा रहा था।

अचानक टिड्डे की नजर चींटी पर पड़ी तो वह बोला, "तुम इतनी तेज गर्मी में इतनी मेहनत क्यों कर रही हो? आओ, थोड़ी मौज मस्ती कर लो।" चींटी बोली, “धन्यवाद, टिड्डे भाई। मैं जरा-सा भी समय बरबाद नहीं कर सकती।

मैं सर्दियों के लिए भोजन इकट्ठा कर रही हूँ। मैं अगर आज यह काम छोड़ दूंगी तो सर्दियों में भूखी मर जाऊँगी।" टिड्डे ने व्यंग्य कसते हुए कहा, "मुझे तुम पर दया आ रही है। तुम्हारे दिल में मौज मस्ती की कोई महत्ता ही नहीं है।

वैसे भी अभी सर्दियाँ आने में बहुत समय है और कल किसने देखा है? तुम कल की चिंता में अपना आज बरबाद कर रही हो।" चींटी ने टिड्डे की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और वह अपना काम करती रही।

चींटी ने कठिन मेहनत से सर्दियों के लिए काफी सारा भोजन इकट्ठा कर लिया था। जबकि टिड्डा यूँ ही मौज-मस्ती करता रहा। समय बीता, मौसम बदला और सर्दियाँ आ गईं। कड़ाके की ठंड पड़ने लगी।

चारों ओर बर्फ पड़ने लगी। पेड़-पौधों से पत्ते झड़ गए। सभी जीव अपने-अपने घरों में दुबक कर बैठ गए। इतनी ठंड में भला घर से बाहर कौन निकलता। लेकिन टिड्डे के पास खाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था।

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कुछ दिन तो कट गए पर अब भूखे रहने की नौबत आ गई। दो दिन तो वह भूखा रहा पर अब उससे भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसे मेहनती चींटी की याद आई। वह चींटी के घर की ओर चल दिया।

चींटी के घर पहुँच कर उसने दरवाजा खटखटाया। चींटी ने दरवाजा खोला और इतनी ठंड में टिड्डे को आया देखकर हैरान रह गई। वह बोली, "नमस्कार, टिड्डे भाई! कहिए कैसे आना हुआ?" | टिड्डा बोला, "बहन, मैं भूख से मर रहा हूँ।

मुझे खाने के लिए कुछ दे दो। मैंने गर्मियाँ गाते-बजाते हुए बिता दीं। अपनी लापरवाही की वजह से सर्दियों के लिए कुछ भी इकट्ठा नहीं कर पाया। अब तुम्हारे पास बड़ी आस लेकर आया हूँ।" इस पर चींटी बोली, "ऐसा है टिड्डे भाई,

अब सर्दियाँ भी नाचते हए बिताओ। गर्मियों में मुझे अनाज ढोता देखकर भी तुम्हें अक्ल नहीं आई, अपितु तुमने मेरा मजाक उड़ाया। हम चींटियाँ, न किसी से कुछ लेती हैं और न किसी को कुछ देती हैं। समझे! अब जाओ यहाँ से।"

ऐसा कहकर चींटी ने दरवाजा बन्द कर लिया। बेचारा टिड्डा रूआँसा होकर वहाँ से लौट गया। वह अपने कई मित्रों के पास मदद के लिए गया। सबके आगे गिड़गिड़ाया कि कुछ खाने को दे दो पर किसी ने उसकी विनती नहीं सुनीं। वह भूख से बिलबिलाता हुआ एक दिन मर गया।

शिक्षाः बिना मेहनत के कुछ नहीं मिलता।

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विशाल पर्वत और छोटी गिलहरी Interesting Hindi Moral Story Download


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एक दिन एक गिलहरी एक पर्वत के पास खुशी से चहकते हुए खेल रही थी। पर्वत की नजर उस पर पड़ी तो उसने मन में सोचा 'इस गिलहरी का छोटा-सा शरीर किसी भी काम का नहीं है फिर भी यह इतनी खुश कैसे रहती है?'

पर्वत ने गिलहरी को बुलाया और बोला, "कितनी छोटी हो तुम! किसी भी काम की नहीं हो। तुम्हें अपने छोटेपन पर हीनभावना महसूस नहीं होती? मेरे सामने तो तुम्हारा कोई अस्तित्व ही नहीं है।"

पर्वत के शब्द सुनकर गिलहरी को बहुत आश्चर्य हुआ। फिर भी वह विनम्रता से बोली, "आपका कहना सही है कि मैं आप की तरह बहुत बड़ी नहीं हूँ। परंतु इसमें नुकसान ही क्या है? मैं अपने आकार से बहुत संतुष्ट हूँ।

अपना हर काम अकेले करने की क्षमता रखती हूँ। इसलिए मुझे अपने छोटे शरीर को लेकर कभी हीनभावना महसूस नहीं होती। मैं जैसी हूँ, अच्छी हूँ और फिर सभी तो आप की तरह बड़े नहीं हैं। सभी का अपना-अपना आकार-प्रकार है।"

पर्वत घमंडपूर्वक बोला, "अरे! बड़े आकार के बहुत लाभ होते हैं। मैं आसमान में उड़ते बादलों को रोक सकता हूँ, उनसे वर्षा करवा सकता हूँ और तुम तो बस उन्हें दूर से ही देख सकती हो। बोलो, करवा सकती हो तुम वर्षा!"

गिलहरी बोली, "नहीं भाई! यह तो मैं नहीं कर सकती। यह आप ही कर सकते हैं, परन्तु कितने ही कार्य ऐसे हैं जो आप नहीं कर सकते और मैं कर सकती हूँ।" पर्वत ने ताव में आकर पूछा, “अच्छा! जरा बताओ।

ऐसे कौन से कार्य हैं?" गिलहरी बोली, "महाशय बुरा मत मानियेगा। क्या आप मेरी तरह अखरोट तोड़ सकते हैं? क्या आप मेरी तरह खेलकूद कर सकते हैं? मैं अभी यहाँ तो अभी वहाँ आ-जा. सकती हूँ।

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दिन रात एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर फुदकती रहती हूँ। सारा दिन मौज-मस्ती करती हूँ। जहाँ मन करता है जाती हूँ। जो मन करता है खाती हूँ। लेकिन आप तो अपनी जगह से हिल भी नहीं सकते। है न!" फिर वह आगे बोली,

"माफ कीजिए, मैं आपको शर्मिंदा नहीं करना चाहती। मैं आपका बहुत सम्मान करती हूँ। आपका विशाल रूप मुझे अच्छा लगता है इसलिए मेरी बात का बुरा मत मानना मैं तो सिर्फ आपकी बात का जवाब दे रही हूँ।

हमेशा याद रखिए कि प्रकृति ने सभी को कोई न कोई विशेष गुण दिया है। इसलिए हमें उन पर घमंड नहीं करना चाहिए।" यह सुनकर पर्वत का सिर शर्म से झुक गया।

आज तक उसे अपनी शक्ति पर बड़ा घमंड था लेकिन आज एक छोटी-सी गिलहरी ने उसे अपनी बुद्धि से पराजित कर सबक सिखाया था।

शिक्षा: हर चीज़ का अपना महत्व होता है।

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कंजूस की नियति Students Hindi Moral Story Download


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किसी समय एक गाँव में एक कंजूस व्यक्ति रहता था। उसके पिताजी एक धनवान व्यक्ति थे और मरते समय उसके लिए वह बहुत सारा धन छोड़ कर गए थे। कंजूस को हमेशा चोरों का डर सताता था।

इसलिए वह उस धन की सुरक्षा को लेकर हमेशा चिंतित रहता था। धन की चिंता में उसका दिन का चैन और रातों की नींद गायब हो गई थी। धन की सुरक्षा का एक उपाय सोचकर एक दिन वह एक सुनसान जंगल में गया।

वहाँ पर एक उपयुक्त स्थान देखकर उसने अपना सारा धन वहाँ एक गड्ढे में छुपाकर रख दिया और उसे मिट्टी से ढक दिया। पहचान के लिए उसने एक चिन्ह भी बना दिया।

उसे इस बात की खुशी थी कि उसने अपना धन एक सुरक्षित स्थान पर रख दिया है। इसके बाद वह प्रतिदिन एक बार अपना धन देखने अवश्य जाता था। यह उसका अटल नियम था। चाहे कुछ भी हो जाए पर वह धन देखने जरूर जाता था।

कंजूस के एक मित्र की नजर हमेशा उसके ऊपर रहती थी। इसलिए उसे बहुत आसानी से कंजूस के धन के रहस्य का पता चल गया।

एक दिन मौका देखकर कंजूस का मित्र उसी सुनसान स्थान पर पहुँचा और उसने बड़ी ही सफाई से वहाँ से सारा धन निकाल लिया। जब अगले दिन कंजूस वहाँ अपना धन देखने गया तो वह वहाँ धन न पाकर भौचक्का रह गया।

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वह अपना सिर पकड़ कर जोर-जोर से रोने लगा। उस दिन से वह बहुत उदास रहने लगा। न किसी से ज्यादा बोलता और न हँसता-मुस्कुराता। एक दिन उसका वही मित्र उससे मिलने आया और उससे पूछा,

"क्या बात है, आजकल तुम बहुत उदास रहते हो?" कंजूस ने कहा, "क्या बताऊँ दोस्त, मैं बर्बाद हो गया हूँ। मैंने चोरी के डर से अपना सारा धन एक सुनसान स्थान पर छुपा कर रखा था। परंतु किसी ने उसे वहाँ से चुरा लिया है।

मेरी तो सारी जमा-पूँजी चली गई।" इस पर उसका मित्र बोला, "इतना निराश मत हो। वह धन तुमने खर्च तो करना नहीं था, वह व्यर्थ ही पड़ा हुआ था। कम से कम अब वह किसी के काम तो आएगा।

जाने उस धन से उस आदमी के कितने काम पूरे हों। वह तुम्हें दुआएँ देगा। रही तुम्हारी बात तो तुम अब ऐसा करो कि उस गड्ढे में एक खाली मटका रख दो और प्रतिदिन उसे देखने चले जाया करो। मटके को देखकर तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुम्हारा धन मटके में सुरक्षित पड़ा है और इस तरह तुम खुश भी रहोगे।"

शिक्षाः जो धन काम न आ सके वो बेकार है।

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बलूत का पेड़ व नरकट के पौधे with Nature Hindi Moral Story Download


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एक झील के किनारे पर एक विशाल बलूत का वृक्ष था। उसका तना बहुत मोटा था और शाखाएँ बहुत बड़ी-बड़ी थी। उसकी जड़ें धरती में बहुत अंदर तक गई हुई थीं। जिनकी सहायता से वृक्ष बहुत मजबूती से धरती पर खड़ा था।

वृक्ष को अपनी कद-काठी पर बड़ा घमंड था। के बलूत वृक्ष के पास ही निकट के कुछ पौधे थे। उनके तने बहुत नर्म व लचीले थे। एक दिन अचानक बहुत तेज हवा चलने लगी। थोड़ी ही देर में हवा ने आँधी का रूप ले लिया।

हालाँकि बलूत के वृक्ष का तना बहुत मजबूत था, परंतु वह आँधी के जोर के आगे खड़ा नहीं हो पा रहा था। हवा वैसे ही चलती रही और कुछ ही समय में बलूत के वृक्ष का तना बीच से टूट गया।

आश्चर्य की बात यह थी कि इतनी तेज आँधी के बावजूद भी नरकट के पौधों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। इस रहस्य को बलूत का वृक्ष समझ नहीं पा रहा था। आश्चर्यवश उसने निकट के पौधों से पूछ ही लिया,

"भाईयो! मैं यह जानने के लिए उत्सुक हूँ कि इतने नाजुक पौधे होते हुए भी आप इतनी तेज आँधी में कैसे बच गए। जबकि इतना मजबूत शरीर होते हुए भी मैं टूट गया। मुझे तो अपने मजबूत तने पर बड़ा भरोसा था।"

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निकट के पौधे बोले, "यह समझना तो बहुत आसान है, बलूत भाई। बुरा मत मानना पर आपको अपनी मजबूती पर घमंड था। इसलिए आपने आँधी के आगे झुकने से इंकार कर दिया और आप पहले की तरह घमंड में खड़े रहे।

यह देखकर आँधी क्रुद्ध हो गई और पूरे जोर से चलने लगी। आखिरकार उसके बल ने आपको पराजित कर दिया। यदि आप भी अपनी मजबूती पर गर्व न करते और आँधी चलने पर थोड़ा झुक जाते तो तेज आँधी आपको तोड़ नहीं पाती।

और आप सुरक्षित रहते। आपको हमसे सीख लेनी चाहिए। हमारे तने बहुत लचीले हैं। जब हवा तेज चलने लगी तो हमने आँधी की प्रभुता को स्वीकार कर लिया और हम उसके आगे झुक गए। इस तरह हम सुरक्षित बच गए।"

नरकट के पौधों की बात सुनकर बलूत के वृक्ष को अब अपनी गलती का अहसास हुआ और वह अफसोस से बोला, "तुमने सही कहा। हमें कभी भी अपनी शक्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए। वरना परिणाम बुरा ही होता है।"

शिक्षाः विनम्रता हानि से बचाती है।

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मोर और बगुला Awesome Hindi Moral Story Download


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एक समय की बात है। एक जंगल में एक मोर घूम रहा था। आकाश काले बादलों से घिरा हुआ था और ऐसा लगता था कि कुछ ही देर में वर्षा होने लगेगी। बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर मोर खुश हो गया और अपने पंख फैलाकर नाचने लगा।

उसे अपने नृत्य व सुंदरता पर बड़ा नाज था। नाचते हुए मोर के पंख बहुत ही सुंदर लग रहे थे। तभी कहीं से उड़ता हुआ एक बगुला भी वहाँ पहुँच गया। उसने मोर को नमस्कार किया और कहा, "वाह मोर भाई!

तुम्हारे पंख तो बहुत सुंदर लग रहे हैं और तुम्हारे नृत्य की प्रशंसा में तो मेरे पास शब्द ही नहीं हैं। तुम्हें देखकर मन खुश हो गया।" मोर घमंडी प्रवृत्ति का था। उसने बहुत  ही घृणित दृष्टि से बगुले की ओर देखते हुए उसके अभिवादन का उत्तर दिया।

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बगुले को मोर का व्यवहार देखकर दुख हुआ। वह बोला, "मोर भाई! आपने मेरी बात का ऐसा फीका-सा जवाब क्यों दिया और आप मेरी ओर इतनी घृणा से क्यों देख रहे हैं?" मोर बोला, "मैं तुम्हारे पंखों को देख रहा हूँ।

कितने बदसूरत हैं ये। न तो इनमें कोई चमक है और न ही कोई रंग है। तुम्हें देखकर मेरा मन घृणा से भर गया। तुम्हें तो कोई भी देखना पसंद नहीं करता होगा और जरा मेरी ओर देखो। कितने सुंदर पंख हैं मेरे।

प्रकृति ने तुम्हारे साथ जो अन्याय किया है, उस पर मुझे दुख हो रहा है। वास्तव में तुम्हारे पंख बहुत बेकार हैं। क्या तुम्हें कभी बुरा नहीं लगता है कि तुम मेरे सामने कितने रंगहीन और कुरूप दिखते हो।

प्रकृति ने तुम्हारे साथ भेदभाव किया है।" यह सुनकर बगुला बोला, "कृपया प्रकृति को दोष न दें। उसने जैसा भी दिया है ठीक दिया है। प्रकृति ने हर प्राणी को आवश्यकतानुसा गुण दिये हैं।

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प्रकृति ने आपको सुन्दर पंख दिये हैं, क्योंकि सुन्दर पंखों से आपक नृत्य मनभावन लगता है। परन्तु मुझे अपने जीवनयापन के लिए लंबी उड़ानों की आवश्यकता पड़ती है।

इसलिए प्रकृति ने मुझे ऐसे पंख दिये हैं जो बदसूरत तो दिखते हैं पर इतने मजबूत हैं कि मैं इनकी सहायता से ऊँचे आकाश में बादलो के साथ उड़ सकता हूँ। जहाँ चाहूँ जा सकता हूँ। मीलों की यात्रा करके भी मैं कभी थकता नहीं हूँ।

इसलिए मेरे पंख तुम्हारे सुंदर पंखों से अधिक उपयोगी हैं। इसलिए मुझे अपने रंग-रूप को लेकर प्रकृति से कोई गिला नहीं है। मैं जैसा हूँ अच्छा हूँ। क्या आप ऐसा कर सकते हैं? नि:सन्देह, आप ऐसा करने में असमर्थ हैं।"

बगुले की बात सुनकर मोर के पास कुछ भी कहने के लिए शब्द नहीं रह गए थे। वह अपने कहे हुए शब्दों पर बहुत शर्मिन्दा हुआ और उसने बगुले से क्षमा माँगी।

शिक्षा: प्रकृति को कभी दोष नहीं देना चाहिए।

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