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Child Story in Hindi Free Download

काकोलूकीयम् Child Story in Hindi Free Download

विष्णु शर्मा ने राजकुमारों से कहा—अब मैं ‘काकोलूकीयम्’ नामक तृतीय तंत्र आरंभ करता हूं जिसका आरंभ इस प्रकार है जो पहले कभी विरोधी रह चुका हो और अब मित्र बनकर आया हो उस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। अवसर पर बने मित्र, लेकिन पूर्व विरोधी कौए द्वारा डाली गई अग्नि से जली हुई उस गिरिकंदरा में बसने वाले उल्लुओं की दयनीय दशा इसका प्रमाण है। दक्षिण के किसी जनपद में महिलारोप्य नाम का एक नगर था। उस नगर के समीप ही एक बहुत विशाल, बहुत घना बरगद का वृक्ष था उस वृक्ष पर मेघवर्ण नाम का कौओं का राजा अपने परिवार एवं प्रजा सहित, दुर्ग बनाकर सुखपूर्वक निवास करता था।

बरगद के उस वृक्ष के समीप ही एक गिरिकंदरा (पहाड़ी-गुफा) थी। उस कंदरा में अरिमर्दन नाम का उल्लुओं का राजा भी अपना दुर्ग बनाकर परिवार एवं प्रजा सहित सुखपूर्वक रहता था। उल्लूओं और कौओं में स्वाभाविक वैर होता है। रात्रि के समय वह उल्लूकराज उस वृक्ष के आसपास मंडराता रहता और जिस भी कौए को अकेला देखता, उसे तत्काल समाप्त कर देता था। ऐसा करते हुए धीरे-धीरे उसने बरगद पर रहने वाले अनेक कौए मार डाले थे। अपने वंश और प्रजा की यह दशा देखकर मेघवर्ण को बहुत चिंता हुई। एक दिन उसने सभी मंत्रियों को बुलाकर सभा की। उसने कहा-‘हमारा जन्मजात शत्रु उल्लू बहुत चालाक है। वह अवसर को भी भली-भांति पहचानता है। प्रतिदिन रात्रि को जब सब सोए होते हैं तो वह अंधकार का लाभ उठाकर हमारे पक्ष का विनाश करता है।

वह हम लोगों को रात्रि में दिखाई नहीं देता और दिन में हमने कभी शत्रु के दुर्ग को देखा नहीं कि वहां जाकर उससे बदला ले सकें। अब हमें क्या करना चाहिए, यह आप सब सोचकर बताएं। मेघवर्ण के पांच मंत्री थे उज्जीवी, संजीवी, अनुजीवी, प्रजीवी एवं चिरंजीवी । उसने सबसे पहले उज्जीवी से पूछा-‘आप इस स्थिति में क्या उपाय उचित समझते हैं ? उज्जीवी बोला-‘महाराज ! बलवान शत्रु से युद्ध नहीं करना चाहिए। उससे तो संघि करना ही हितकर होता है। युद्ध से हानि ही है समान बल वाले शत्रु से भी पहले संधि करके, कछुए की भांति सिमटकर, फिर शक्ति संग्रह करने के बाद ही युद्ध करना उचित रहता है। अरिमर्दन बलवान है, अतः उसके साय तो संधि करना ही उचित रहेगा। मेघवर्ण ने फिर अपने दूसरे मंत्री संजीवी से पूछा-‘भद्र ! इस विषय में आपके क्या विचार हैं ?

संजीवी बोला—’स्वामी ! शत्रु के साथ संधि नहीं करनी चाहिए। शत्रु तो संधि के बाद भी नाश ही करता है। पानी अग्नि द्वारा गरम किए जाने पर भी अग्नि को बुझा देता है। क्रूर, अत्यंत लोभी और धर्मविहीन शत्रु के साथ तो कभी संधि करनी ही नहीं चाहिए। शत्रु के प्रति शांति भाव दिखलाने से उसकी शत्रुता की आग और भी भड़क जाती है। जिस शत्रु से आमने-सामने की लड़ाई लड़ना संभव न हो, उसे छल-बल द्वारा पराजित करना चाहिए, किंतु संधि नहीं करनी चाहिए। जिस राजा की भूमि शत्रुओं के रक्त और उनकी स्त्रियों के अश्रुओं से भीग नहीं गई उस राजा के जीवन की प्रशंसा ही क्या हो सकती है ?’ जब मेघवर्ण ने अपने तृतीय मंत्री अनुजीवी से यही प्रश्न पूछा तो उसने परामर्श

दिया-‘महाराज ! हमारा शत्रु दुष्ट है, बल में भी अधिक है, इसलिए इसके साथ संधि और युद्ध दोनों करने में हानि है। उसके लिए तो शास्त्रों में पलायन नीति का प्रावधान है। हमें यहां से किसी दूसरे देश में चले जाना चाहिए। इस तरह पीछे हटने में कायरता का दोष नहीं लगता। सिंह भी तो हमला करने से पहले पीछे हटता है। वीरता का अभिमान छोड़कर जो व्यक्ति हठपूर्वक युद्ध करता है वह शत्रु की ही इच्छापूर्ति करता है और अपने वंश का नाश करता है।’ इसके बाद मेघवर्ण ने अपने चौथे मंत्री से पूछा तो उसने उत्तर दिया-‘स्वामी !

मेरी सम्मति में तो ये तीनों नीतियां ही दोषपूर्ण हैं। हमें आसान नीति अपनानी चाहिए। अपने स्थान पर डटे रहना ही श्रेष्ठ उपाय है। अपने स्थान पर बैठा मगरमच्छ किसी सिंह को भी परास्त कर देता है। वह हाथी तक को पानी में खींच लेता है। यदि वह अपना स्थान छोड़ दे तो कोई साधारण कुत्ता भी उसे परास्त कर देता है। अपने दुर्ग में बैठकर हमारा एक सैनिक सौ-सौ शत्रुओं का नाश कर सकता है। हमें अपने दुर्ग को सुदृढ़ बनाना चाहिए। अपने स्थान पर दृढ़ता से खड़े छोटे-छोटे वृक्षों को आंधी-तूफान के प्रबल झोंके भी नहीं उखाड़ सकते।’ तब मेघवर्ण ने चिरंजीवी नामक अपने पांचवें मंत्री से प्रश्न किया उसने

कहा-महाराज ! मुझे तो संश्रय नीति ही उचित प्रतीत होती है। किसी बलशाली सहायक मित्र को अपने पक्ष में करके ही शत्रु को हरा सकते हैं। अतः हमें किसी मित्र समर्थ सहायता होनी चाहिए। यदि एक समर्थ मित्र न मिले तो अनेक छोटे-छोटे मित्रों की सहायता भी हमारे पक्ष को सबल बना सकती है, छोटे-छोटे तिनकों से गुंथी हुई रस्सी भी इतनी मजबूत बन जाती है कि हाथी को जकड़कर बांध देती है। पांचों मंत्रियों से परामर्श लेने के बाद मेघवर्ण ने अपने पिता के काल से मंत्री पद पर कार्य करने वाले स्थिरजीवी के सम्मुख उपस्थित होकर विनम्र भाव से

कहा-‘तात ! आपके होते हुए भी मैंने अपने मंत्रियों से जो परामर्श लिया है वह केवल उनकी परीक्षा के लिए लिया है, जिससे कि आप उनके उत्तरों को ध्यान में रखकर किसी उचित निष्कर्ष पर पहुंच सकें और मुझे योग्य निर्देश दे सकें। वह सब आप सुन ही चुके हैं, अतः अब कृपा करके अपना निर्देश दीजिए।

स्थिरजीवी ने यह सुनकर कहा—’वत्स ! तुम्हारे पांचों मंत्रियों ने जो सम्मति व्यक्त की है वह शास्त्रसम्मत ही है। किंतु मेरी सम्मति में तो तुम्हें द्वेधीमान अथवा भेद-नीति का ही आश्रय लेना चाहिए। उचित यही है कि हम पहले संधि द्वारा अपने शत्रु में अपने प्रति विश्वास पैदा कर लें, किंतु शत्रु पर विश्वास न करें। हम संधि करके युद्ध की तैयारियां करते रहें, तैयारियां पूरी हो जाने पर युद्ध छेड़ दें। संधि काल में हमें शत्रु के निर्बल स्थानों का पता लगाते रहना चाहिए। उससे परिचित होने के बाद वहीं आक्रमण कर देना उचित है। इस पर मेघवर्ण बोला-‘पर तात ! मुझे तो उनके आवास का भी पता नहीं है, फिर मैं उनके छिद्रों को कैसे जान पाऊंगा ?

तब स्थिरजीवी बोला—’उसके लिए तुम्हें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है वत्स। मैं अपने गुप्तचरों द्वारा सब पता करवा लूंगा। चतुर व्यक्ति अथाह जल में बल्लियां डालकर उसकी भी गहराई का पता लगा लेते हैं कार्यकुशल एवं दक्ष गुप्तचर शत्रु के कमजोर पक्ष को भेदकर उसके गुप्त भेदों को भी जान जाते हैं।’

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